CHAPTER-1
(OSCILLOSCOPE AND TRANSISTOR)
1. CRO का पूरा नाम कैथोड-रे ऑसिलोस्कोप होता है।
2.वोल्टेज पर ऑपरेट होते है। इनका उपयोग तथा अन्य को खोजने के लिए भी किया जाता है।
3.ट्रांजिस्टर का आविष्कार अमेरिका की बैल लेबोरेट्री में 1948 में विलियम शॉकले, जानॅ वार्डीन तथा वेल्टर ब्रटेन द्वारा किया गया था।
4.CRO कैथोड रे ऑसिलोस्कोप समय के साथ परिवर्तित होने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नलों का विजुअल डिस्पले उपलब्ध कराता है।
5.CRO के स्क्रीन पर किसी फ्लोरोसेन्ट पदार्थ की कोटिंग शीट का कार्य करती है। जिस पर प्लॉट अथवा ग्राफ बनतें है।
6.एक सामान्य में एक क्षैतिज इनपुट प्रयुक्त की जाती है। जो एक रैम्प वोल्टेज होती है। इसे टाइम बेस या सॉ-टूथ वोल्टेज कहतें है।
7. कैथोड रे ऑसिलोस्कोप पर अत्यन्त निम्न आवृत्ति (डी.सी. से 20 Hz) से अत्यन्त उच्च आवृत्तियों (1 GHz) तक के सिग्नलों की तरंगों के आकार, प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकतें है।
8.CRT द्वारा उत्पन्न इलेक्ट्रानों की Focussed beam,
Cathode ray कहलाती है।
9.ट्रांजिस्टर एक ठोस अवस्था युक्ति होती है।
10.ट्रांजिस्टर के अविष्कार के पहले वैक्यूम ट्रायोड प्रयुक्त किये जाते थें।
11.जब एक N- प्रकार के पदार्थ की परत को दो P- प्रकार के पदार्थ की परतों के मध्य सैण्डविच किया जाता है। तो P-N-P ट्रांजिस्टर प्राप्त होता है।
12.जब एक P- प्रकार के पदार्थ की एक परत को N- प्रकार के पदार्थ की परतों मध्य सैण्डविच किया जाता है। तो प्राप्त ट्रांजिस्टर को N-P-N ट्रांजिस्टर कहतें है।
13.N-P-N के लिए इलेक्ट्रॉन अतिसंख्यक आवेष वाहक होतें है।
14.P-N-P के लिए कोटर अतिसंख्यक आवेष वाहक होतें है।
15.E उत्सर्जक यह ट्रांजिसटर का बायां क्षेत्र होता है। इसका मुख्य कार्य अतिसंख्यक आवंेष वाहकों की पूर्ति करना होता है।
16.E उत्सर्जक को B आधार के सापेक्ष सदैव अग्र बायस अवस्था में रखा जाता है। इसे तीर के नीषान से दर्षाया जाता है।
17.उत्सर्जक की डोपिंग सदैव अत्यधिक मात्रा में की जाती है। ताकि यह अत्यधिक मात्रा में ही आवेष वाहकों की पूर्ति कर सकें।
18.संग्राहक यह ट्रांजिसटर का दायां क्षेत्र होता है। इसका मुख्य कार्य अतिसंख्यक आवेष वाहकों को इकट्ठा करना होता है।
19.संग्राहक को पष्च बायस अवस्था मंे जोडा जाता है।
20.आधार यह ट्रांजिसटर का मध्य भाग होता है। एवं इसकी डोपिंग अत्यधिक कम रखी जाती है।
21.इसे उत्सर्जक तथा संग्राहक की तुलना में पतला(लगभग सा) रखा जाता है। ताकि यह लगभग सारे आवेष वाहकों को संग्राहक में भेज सकें।
22.ट्रांजिसटर के कार्य करतें समय संग्राहक संधि पर अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है। जिसे अवषोषित करना अतिआवष्यक होता है। इसलिए संग्राहक का आकार उत्सर्जक की तुलना में अधिक रखा जाता है।
23.P-N-P ट्रांजिसटर में धारा प्रवाह उत्सर्जक से आधार की तरफ होता है।
24.N-P-N ट्रांजिसटर में धारा प्रवाह आधार से उत्सर्जक की तरफ होता है।
25.ट्रांजिसटर के अलग-अलग सिरों पर DC विभव को आरोपित करने की प्रक्रिया को बायसिंग कहतें है।
26.ट्रांजिसटर सिलिकॉन या जर्मेनियम के क्रिस्टल से बना होता है।
27.आधार की मोटाई उत्सर्जक तथा संग्राहक की तुलना में कम होती है।
28.एक ट्रांजिसटर के सामान्य संचालन हेतु इसकी उत्सर्जक-आधार संधि को अग्र बायसित किया जाता है।
29.ट्रांजिसटर के सामान्य संचालन हेतु इसकी संग्राहक-आधार संधि को पष्च बायसित किया जाता है।
30.ट्रांजिसटर में सामान्यतः तीन टर्मिनल होते है।
31.कॉमन आधार परिपथ में इनपुट सिग्नल उत्सर्जक तथा आधार के मध्य प्रदान किया जाता है।
32.कॉमन आधार परिपथ में आउटपुट सिग्नल संग्राहक तथा आधार टर्मिनल से लिया जाता है।
33.कॉमन उत्सर्जक परिपथ में इनपुट सिग्नल, आधार तथा उत्सर्जक के मध्य प्रदान किया जाता है।
34.कॉमन उत्सर्जक परिपथ में आउटपुट सिग्नल संग्राहक तथा उत्सर्जक टर्मिनल से लिया जाता है।
35.कॉमन संग्राहक परिपथ में इनपुट सिग्नल आधार तथा संग्राहक टर्मिनल के मध्य प्रदान किया जाता है।
36.कॉमन संग्राहक परिपथ में आउटपुट सिग्नल, उत्सर्जक तथा संग्राहक टर्मिनल से लिया जाता है।
37.कॉमन संग्राहक परिपथ को उत्सर्जक फॉलोअर भी कहतें है।
38.उच्च आवृत्ति परिपथों में कॉमन आधार ट्रांजिसटर का उपयोग किया जाता है।
39.निम्न आवृत्ति परिपथों में कॉमन उत्सर्जक ट्रांजिसटर का उपयोग किया जाता है।
40.कॉमन संग्राहक ट्रांजिसटर को प्रतिबाधा मैचिंग तथा बफर स्टेज के रूप में प्रयोग किया जाता है।
41.CRO की डिफ्लैक्षन सेन्सिटिविटी का मात्रक है।
42.CRO में टाइमबेस सिग्नल उच्च आवृत्ति की सॉ टूथ तरंग होती है।
43.कैथोड किरण ट्यूब (CRT) में बीम धारा को CRO के फ्रन्ट पैनल पर लगे FOCUS कन्ट्रोल द्वारा एडजस्ट किया जा सकता है।
44.CRO बीम द्वारा स्क्रीन पर फॉस्फेट के एक निष्चित क्षेत्र को उत्तेजित करने का समय कन्ट्रोल द्वारा एडजस्ट किया जा सकता है।
45.एक CRO की विषिष्टता प्लेट पर 50MHz अंकित है। इसका अर्थ यह है। कि स्वीप सिग्नल की आवृत्ति 50MHz है।
46.CRO के स्क्रीन पर स्पॉट का कलर स्क्रीन की कोटिंग में प्रयुक्त पदार्थ का अभिलक्षण प्रदर्षित करता है।
47.CRO द्वारा ए.सी. वोल्टेज का r.m.s. peak एवं औसत मान ज्ञात किया जा सकता है।
48.CRO वोल्टेज का peak to peak का मान प्रदर्षित करता है।
49.CRO ए.सी. सिग्नल व डी.सी. सिग्नल प्रदर्षित करता है।
50.ट्रांजिस्टर निम्न धारा एवं निम्न वोल्टेज युक्ति है।
51.ट्रांजिस्टर की शून्य सिग्नल का स्थिति का अर्थ है। सिग्नल वोल्टेज शून्य है।
52.ट्रांजिस्टर में संग्राहक को प्रायः पष्च बायस में जोडा जाता है।
53.NPN ट्रांजिस्टर में P परत मोटाई कम होती है। क्योकि संग्राहक 90 से अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर सके।
54.ट्रांजिस्टर के आउटपुट अभिलक्षण ट्रायोड वाल्व के अभिलक्षणों के समान हैं।
55.तापक्रम बढने पर संग्राहक धारा बढती है।
56.सामान्य रूप से प्रयुक्त कॉमन उत्सर्जक प्रवर्धक परिपथ है।
57.NPN ट्रांजिस्टर PNP ट्रांजिस्टर की तुलना मंे अधिक प्रयुक्त किये जाने का कारण, यह ट्रांजिस्टर सस्तें और सरलता से उपलब्ध हो जातें है। प्रचालन तापमान की अधिकतम सीमा होती है।
58.ट्रांजिस्टर से उपलब्ध धारा प्रवर्धन, वोल्टेज प्रवर्धन, शक्ति प्रवर्धन है।
59.परिपथों में ट्रांजिस्टर को संयोजित करने की तीन विधियां है।
60.कॉमन उत्सर्जक ट्रांजिस्टर में संग्राहक आधार संधि का प्रतिरोध, उत्सर्जक आधार संधि की तुलना अधिक होता है।
61.ट्रांजिस्टर को धात्विक प्लेट पर लगाने का कारण ताकि ट्रांजिस्टर की अत्यधिक ऊष्मा को aफैलाना है।
62.एक ट्रांजिस्टर में दो PN जंक्षन होते है।
63.एक NPN ट्रांजिस्टर चालन करता है। जब आधार के सापेक्ष संग्राहक धनात्मक एवं उत्सर्जक ऋणात्मक हो।
64.ट्रांजिस्टर बनाने की विधि जंक्षन विधि तथा प्वॉइन्ट कॉन्टेक्ट विधि, डिफ्यूज्उ जंक्षन विधि, सिलिकॉन प्लेनर ट्रांजिस्टर विधि है।
65.अग्र बायस की स्थिति में उत्सर्जक-आधार संधि पर, संधि विभव का मान कम होता है।
66.ट्रांजिस्टर बायसिंग के लिए आधार प्रतिरोधक बायसिंग परिपथ, फीडबैक प्रतिरोधक बायसिंग परिपथ, उत्सर्जक प्रतिरोधक बायसिंग परिपथ उपयोग में लेते है।
67.ट्रांजिस्टर के तीन टर्मिनल होते है।
68.ट्रांजिस्टर को डिजिटल परिपथ सेचुरेषन और कट ऑफ रीजन में प्रचालित किया जाता है।
69.ट्रांजिस्टर को स्विचिंग युक्ति या वेरिएबल रेसिस्टर के समान प्रयोग किया जा सकता है।
70.ट्रांजिस्टर में आधार धारा द्वारा, संग्राहक धारा नियन्त्रित की जाती है।
71.जिन ट्रांजिस्टर में विद्युत धारा चालन होल्स तथा मुक्त इलेक्ट्रॉन दोनों प्रकार के आवेष वाहकों के द्वारा सम्पन्न होता है। बाइपोलर ट्रांजिस्टर कहलातें है।
72.कॉमन बेस ट्रांजिस्टर विन्यास का प्रयोग डिफरैन्षियल एम्प्लीफायर के लिए किया जाता है।
73.ट्रांजिस्टर की वास्तविक कार्यस्थिति का परीक्षण इन सर्किट टैस्ंिटग द्वारा किया जाता है।
74.ट्रांजिस्टर बायसिंग के लिए नियत मान की डी.सी. वोल्टेज प्रदान की जाती है।
75.जिन ट्रांजिस्टर में विद्युत धारा चालन केवल एक प्रकार के आवेष वाहकों द्वारा सम्पन्न होता हैं, वह यूनीपालर ट्रांजिस्टर कहलातें है।
76.कुछ ट्रांजिस्टर में चौथा संयोजक शील्डिंग के लिए होता है।
77.ट्रांजिस्टर में दो डिप्लीषन लेयर होती है।
78.एम्प्लीफायर के लिए ट्रांजिस्टर एक्टिव रीजन में होना चाहिए।
79.उत्सर्जक रैसिस्टर को कैपेसिटर में बाइपास करने से ऑपरेटि।ग प्वॉइण्ड स्टेबिलाइज होता है।
80.ट्रांजिस्टर परिपथ पर गलत बायस से आटपुट में डिस्टॉर्षन होता है।
Super sir
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